कश्मीर की खिचड़ी अमावस्या by Dr. Agni Shekhar || LIVE IMAGE


●पूस अमावस कश्मीरियों के लिए यक्ष-अमावस्या और खिचड़ी अमावस्या के नाम से प्रसिद्ध है ।
यह यक्षों की पूजा का एक प्राचीन पर्व है ।इस दिन प्रत्येक कश्मीरी पंडित घर में 'यछ' ( यक्ष) के लिए खिचड़ी का भोग बनाया जाता है।
● पूरे परिवार में एक उत्सव धर्मिता का वातावरण होता है। रसोई घर की साफ सफाई, लिपाई पुताई होती है और धुले हुए पतीले में मूंग की खिचड़ी तथा यथा परंपरा मूली की तली तीखी लाल चटनी या अन्य कोई व्यंजन बनाया जाता है।
कड़म के साग का अचार का सीलबंद घड़ा या मर्तबान इसी दिन खोला जाता था जो एक तरह से अनिवार्य रस्म होती थी और आज भी है।यों तो अब बाज़ार से अचार का पैक लाया जाता है।
● यक्ष पूजा की यह पर्व प्राचीनकाल है जो हमें 'नीलमतपुराण' में वर्णित सतीसर उपाख्यान से जोड़ता है। नीलमतपुराण के अनुसार प्राचीन कश्मीर में नाग,यक्ष,
गंधर्व, दैत्यों का रहवास था।
यों तो पुराणों में यक्षों का निवासस्थल कश्मीर के अलावा ऊपरी हिमालयी क्षेत्र बताया गया है ,जैसे उत्तराखंड और हिमाचल।
यक्ष धन संपदा के स्थानीय देव थे और यक्ष-नरेश कुबेर की तो पुराणों में और लोकवार्ता में प्रतिष्ठा सर्वविदित है ही।
● कुबेर को शिव का भक्त कहा गया है जिसका नगरी हिमालय में अलकापुरी है जिसे कैलास पर्वत के पास स्थित बताया गया है।
कश्मीर की लोकमान्यता के अनुसार 'यछ' के रूप में पूस की अमावस को अंधेरे में अपने संगी साथियों के साथ वह हिमाच्छादित पर्वतों से कश्मीर घाटी में उतरकर हर घर में पलभर के लिए उन्हें आशीष देने आते हैं।
●कश्मीरी परिवारों में उनकी आवभगत और पूजा हेतु पूरी आनुष्ठानिक तैयारी पहले से होती है। सूखे घास से एक घोल चक्री, जिसे कश्मीरी में 'ऑअर' कहते हैं जो भोग के पात्र के नीचे धुली जगह पर आसन के रूप में रखी जाती है।
घास की इस 'ऑअर' पर पूजा के बाद ताज़ा सकोरे में मूंग की गरम गरम खिचड़ी रखी जाती है। साथ में धुला हुआ सिंदूर- तिलक लगाया हुआ 'काजवठ'
(सिलबट्टा)भी रखा जाता है जिसे हिमालय या मेरू पर्वत के प्रतीक स्वरूप माना जाता है ।
कुबेर उत्तर दिशा का स्वामी तथा सप्त मातृकाओं को संरक्षक माना जाता है।
कइयों की मान्यता है कि कश्मीरी संस्कृति में विशेषकर इस पर्व पर 'काजवठ' कुबेर का ही विग्रह रूप है ।
● इस कारण कश्मीरी पंडितों में यह मान्यता रही है कि 'काजवठ' को कभी किसी को नही देना चाहिए, भले ही पड़ोसी कुछ देर के लिए भी उधार ही क्यों न मांगे। 'काजवठ' यक्षराज कुबेर की धन-संपदा देने वाला उपास्य प्रतीक है।
मान्यता यह भी रही है कि कश्मीरी पंडित बेटी के विवाह में 'काजवठ' को दहेज के साथ देते थे ताकि उसकी ससुराल में यक्षराज कुबेर की कृपा बनी रहे ,उसे अभावों का सामना न करना पड़े।
● विवाह मंडप पर वर- वधु इसी यछ अर्थात् कुबेर के सामने जीवन में एक दूसरे के प्रति वफादार रहने की शपथ उठाते हैं ,इतनी गहन मान्यता है इस काजवठ अर्थात् सिलबट्टे की।


मान्यता यह भी है कि 'यछ' (यक्ष) घरों के भीतर प्रवेश नहीं करते ,इसलिए वह आगँन में आकर ढाई आवाज़ देते हैं -
"वाॅफ्फ..वाॅफ्फ..वुफ् !"

और यह ढाई आवाज़ यक्ष आँगन या आँगन की दीवार पर रखे खिचड़ी भोग का स्वाद चखकर निकाल कर हवा की गति से अंतर्ध्यान हो जाता है।
मान्यता है कि यह नाटे कद का यछ (यक्ष) सोने की टोपी पहने होता है जो उसे अपने प्राणों से प्यारी होती है।इसे "यछ टूप्य"( यक्ष की टोपी)
कहते हैं जिसे अगर घर का कोई पुण्यात्मा सदस्य झपटकर उसके सिर से उठाकर घर के अंदर भागे तो यछ बेबस होकर आपके घर को अकूत धन दौलत से मालामाल करता है और बदले में टोपी वापस चाहता है।

● कई कथाएं इस टोपी और यछ से जुड़ी हमें बचपन में सुनने को मिलती थीं कि कैसे भेस बदलकर यछ उस घर में नौकर बनकर रहा और रसोई में पानीआरा ( पेय जल के घडे रखने की जगह) के पास कोने में 'च़्वकेर' ( एक प्रकार का खट्टा अचार) के घड़े के नीचे छिपा कल रखी सोने की टोपी को चुराना चाहता था।

क्योंकि मान्यता है कि यछ खट्टे अचार के घड़े के निकट नहीं जाता।



Dr. Agni Shekhar

Poet , Writer, Activist in Exile

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