रवांडा नरसंहार क्यों हुआ ? || Rwanda Genocide 1994 || By Rama Deepak || LIVE IMAGE


रवांडा नरसंहार क्यों हुआ ? || Rwanda Genocide 1994 || By Rama Deepak || LIVE IMAGE

1990 के आस-पास अफ्रीकी महाद्वीप का छोटा सा देश रवांडा खेती करने में मशगूल था | क्योंकि यहां पर उद्योग उतने नहीं आ पाए थे | यहां की 85 प्रतिशत जनसंख्या हुतू थी | यहां के आदिम निवासी त्वा एक पिग्मी ग्रुप से आते थे, ये बहुत कम संख्या में थे | बाकी की जनसंख्या तूत्सी की थी | 

रवांडा यूरोपियन देश बेल्जियम कॉलोनियल साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था | कॉलोनियल देशों की परंपरा के मुताबिक दोनों समुदायों को बांट के रखा जाता था | बेल्जियम वाले तूत्सी को सपोर्ट करते थे | तूत्सी लोगों ने इस शह में हुतू लोगों पर अत्याचार किए थे | पर फिर रवांडा आजाद हुआ | बेल्जियम वाले तो आराम से चले गए | पर तूत्सी लोगों से बदला लिया जाने लगा |


Juvenal Habyarimana || Former President of Rwanda || Party: National Republican Movement for Democracy and Development

1973 में हुतू समुदाय के मेजर जनरल जुवेनल हेबरीमाना सत्ता में आए | अगले दो दशक तक वही सत्ता में बने रहे | उन्होंने एक नई पार्टी बना ली. संविधान में संशोधन किया | लगातार प्रेसिडेंट चुने जाते रहे.. 1990 में तूत्सी रिफ्यूजी लोगों ने रवांडन पैट्रियॉटिक फ्रंट बना लिया. और युगांडा में रह रहे अपने लोगों से अपनी ताकत जुटाकर रवांडा पर हमला कर दिया. फिर 1992 में रवांडा सरकार और इन लोगों में समझौता हो गया | 1993 में हेबरीमाना ने ये बात मान ली कि तूत्सी रिफ्यूजी नेताओं को भी सरकार में शामिल किया जाएगा| पर इस बात से हुतू समुदाय नाराज हो गया. ये नाराजगी सिर्फ शब्दों में नहीं रही |

Juvenal Habyarimana,  President of Rwanda And Cyprien Ntaryamira, President of Burundi

6 अप्रैल 1994 को एक हादसा हुआ, जिसने नाराजगी को कत्ल-ए-आम में बदल दिया | हुआ ये कि हेबरीमाना और बुरुंडी के प्रेसिडेंट सिप्रियन नारियामिरा एक प्लेन से जा रहे थे |  और किगाली के ऊपर इस प्लेन को उड़ा दिया गया पर ये नहीं पता चल पाया कि ये हमला हुतू समुदाय के लोगों ने किया था या फिर तूत्सी समुदाय के लोगों ने | प्लेन क्रैश के एक घंटे के अंदर सैनिकों ने हुतू समुदाय के लोगों के साथ मिलकर चारों ओर रोड बंद कर दिए और तूत्सी लोगों को मारने लगे | हुतू प्रधानमंत्री अगाथे यूविलिंगिमाना और उनके दस बॉडीगार्ड को मार दिया गया. प्रेसिडेंट और पीएम के मरते ही लीडरशिप क्राइसिस हो गया. और एक अतिवादी नेता ने सत्ता ले ली |



इसके बाद किगाली में पहला बड़ा हमला हुआ, 13 अप्रैल 1994 को सुबह होने से ठीक पहले एक चर्च में सैनिक घुसे | बंद दरवाजे के अंदर सैकड़ों लोग प्रार्थना कर रहे थे | सैनिकों ने भीड़ को कोई सूचना दिए बगैर हैंडग्रेनेड फेंक दिया | फिर मशीनगन से दनादन फायरिंग करने लगे. जैसे-जैसे भीड़ सहम रही थी, सैनिक बंदूकें चलाना छोड़ चाकू और चापड़ से लोगों को काटने लगे. जब सूरज उगा, चर्च के अंदर करीब 1200 लोग मारे जा चुके थे |  इनमें ज्यादातर बच्चे ही थे |


इस नरसंहार से पहले बेहद सावधानी पूर्व चरमपंथियों को,सरकार की आलोचना करने वालों के नामों की सूची दी गई | इसके बाद इन लड़ाकों ने सूची में शामिल लोगों को उनके परिवार के साथ मारना शुरू कर दिया |


रवांडा नरसंहार में आने वाले सौ दिनों में 8 लाख लोग मारे गए | मतलब हर रोज दस हजार लोग | सारे लोग गोलियों और बमों से ही नहीं मारे जाते थे | ज्यादातर को चाकू, चापड़ या डंडों से मारा गया था | मारने वालों में सिर्फ रवांडा के सैनिक ही नहीं थे, बल्कि वहां के हुतू समुदाय के लोग भी थे | मरने वाले ज्यादातर लोग तूत्सी समुदाय से आते थे | ये सारे लोग एक-दूसरे के साथ पढ़ते थे, खेलते थे, साथ काम करते थे | मारते समय इस बात का खास ख्याल रखा गया कि औरतों का रेप जरूर हो | किसी लड़ाई में रेप का हथियार की तरह इस्तेमाल का सबसे बड़ा उदाहरण यहां मिला |



इसके बाद सरकारी रेडियो स्टेशनों पर अफसर आदेश देने लगे कि अपने पड़ोसियों को भी मारना शुरू करिए | यही नहीं, कुछ हूतू युवकों ने अपनी पत्नियों को भी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि उनके मुताबिक़, अगर वो ऐसा न करते तो उन्हें जान से मार दिया जाता|

Passport for Identification of Citizen of Rawanda

उस समय हर व्यक्ति के पास मौजूद पहचान पत्र में उसकी जनजाति का भी ज़िक्र होता था, इसलिए लड़ाकों ने सड़कों पर नाकेबंदी कर दी, जहां चुन-चुनकर तुत्सियों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई |


लेकिन इस भयानक नरसंहार का अपराधी और दोषी था- वहां का मीडिया खासकर एक पत्रिका- कंगूरा और कुछ रेडियो स्टेशन


The Office of RTLM During Rawanda Genocide

जिन्होंने उस दौरान कई महीनों से तुत्सी जनजाति के खिलाफ न सिर्फ एकतरफा नफरत, घृणा और कुप्रचार का प्रोपैगंडा अभियान चला रखा था बल्कि नरसंहार से ठीक पहले रेडियो स्टेशन-आरटीएलएम ने खुलेआम तुत्सी लोगों के खिलाफ आखिरी युद्धछेड़ने और तिलचट्टों (काक्रोचों) का सफायाकरने का आह्वान किया था | यही नहीं, आरटीएलएम रेडियो ने नरसंहार के दौरान अपने प्रसारणों में किन लोगों को मारा जाना है, उनकी लिस्ट प्रसारित की और वे कहां मिलेंगे, यह भी बताया |


नरसंहार कैसे ख़त्म हुआ?

युगांडा सेना समर्थित, सुव्यवस्थित तूत्सी रिफ्यूजियों की सेना आरपीएफ़ ने धीरे-धीरे अधिक से अधिक इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया.4 जुलाई 1994 को इसके लड़ाके राजधानी किगाली में प्रवेश कर गए |


Paul Kagame And Rwandan Patriotic Front Army

बदले की कार्रवाई के डर से 20 लाख हूतू, जिनमें वहां की जनता और हत्याओं में शामिल लोग भी थे, पड़ोस के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में पलायन कर गए | कुछ लोग तंज़ानिया और बुरुंडी भी चले गए |

इसके बाद दोनों समुदायों में संधि हो गई. सरकार बनी. हुतू प्रेसिडेंट और तूत्सी वाइस प्रेसिडेंट बने | हेबरीमाना की पार्टी जिसने नरसंहार किया था, बैन कर दी गई | नया संविधान बना और पहली बार ढंग से चुनाव हुए | ये नरसंहार राजनीतिक नफरत के उदाहरण के रूप में लिया जाता है |


United Nations 

अन्तर्राष्ट्रीय भूमिका

रवांडा में संयुक्त राष्ट्र और बेल्जियम की सेनाएं थीं लेकिन उन्हें हत्याएं रोकने की इजाज़त नहीं दी गई |

इस नरसंहार के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम समेत तमाम देशों को उनकी निष्क्रियता के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र यहां शांति स्थापना करने में नाकाम रहा। वहीं, पर्यवेक्षकों ने इस नरसंहार को समर्थन देने वाली फ्रांस की सरकार की भी जमकर आलोचना की।

मानवाधिकार के पैरोकार अधिकांश पश्चिमी देश इस पूरे मसले को खामोशी से देखते रहे। आधुनिक शोध इस बात पर बल देते हैं सामान्य जातीय तनाव इस नरसंहार की वजह न होकर इसकी वजह युरोपीय उपनिवेशवादी देशों द्वारा अपने स्वार्थों के लिये हुतू और तुत्सी लोगों को कृत्रिम रूप से विभाजित किया जाना है।



 क्या किसी को सज़ा मिली?

रवांडा नरसंहार के बहुत सालों बाद 2002 में एक अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत का गठन हुआ लेकिन उसमें हत्या के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा नहीं मिल पाई | इसकी जगह दोषियों को सज़ा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने तंज़ानिया में एक इंटरनेशनल क्रिमिलन ट्रिब्यूनल बनाया |


कुल 93 लोगों को दोषी ठहराया गया जनसंहार के मामले में कई हाईप्रोफ़ाइल लोगों को सज़ा मिली है, इनमें रवांडा के कई मंत्री और सेना के कमांडर भी शामिल हैं | अब इन्हें जेल में भेजा जाएगा | मामले के आठ अभियुक्त अभी भी फ़रार चल रहे हैं |


Rwanda Genocide - Open Court

रवांडा में सामाजिक अदालतें बनाई गईं ताकि नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार हज़ारों संदिग्धों पर मुकदमा चलाया जा सके | एक दशक तक ये अदालतें पूरे देश में हर हफ़्ते लगती थीं, अक्सर ये बाज़ारों या किसी पेड़ के नीचे लगती थीं | इनके सामने हल करने को 12 लाख मामले थे.संवाददताओं का कहना है कि मुकदमा चलने से पहले ही 10 हज़ार लोगों की मौत जेलों में हो गई |


Paul Kagame - (Tutsi) President of Rwanda

इस समय रवांडा में हालात कैसे हैं?

आंतरिक संघर्ष से टूट चुके इस देश को पटरी पर लाने के लिए राष्ट्रपति पॉल कागामे को श्रेय दिया जाता है | जिनकी नीतियों ने देश में तेज़ आर्थिक विकास की नींव रखी | उन्होंने रवांडा को टेक्नोलॉजी हब बनाने की कोशिश की और वो ख़ुद ट्विटर पर बहुत सक्रिय रहते हैं | कागामे तीन बार राष्ट्रपति चुने गए और 2007 के चुनाव में उन्हें 98.63 प्रतिशत वोट मिले लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि वो विरोधियों को बर्दाश्त नहीं करते और उनके कई विरोधियों की देश में और बाहर भी रहस्यमय तरीक़े से मौतें हो गई | 

जनसंहार रवांडा में अभी भी एक संवेदनशील मुद्दा है और जनजातीयता (एथ्नीसिटी) के बारे में बोलना ग़ैर-क़ानूनी है | सरकार का कहना है कि और अधिक ख़ून बहाने और नफ़रत फैलाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया है |

 Rama Deepak

  M.A. Hindi 
  M.A. Mass Communication


Rwanda Genocide 1994 || Hindi Documentary 2021 || 4k || TIRUPATI PRODUCTION



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