कश्मीर की खीरभवानी : प्रादुर्भाव, महात्म्य और इतिहास by Dr. Agni Shekhar || LIVE IMAGE

महाप्राण निराला की कालजयी कविता 'राम की शक्ति पूजा' में कवि ने राम से जिस पौराणिक देवी की आराधना करवाई है, वह कश्मीर की महाराज्ञी हैं जिनका तीर्थ तुलमुल में खीरभवानी के नाम से प्रसिद्ध है। कश्मीर की प्रमुख आराध्य देवी महाराज्ञी के साथ यह संबंध मुझे चौंका गया था पहली बार।
मुझे याद है कि मैंने कक्षा में अपने शिक्षक से हाथ उठाकर प्रश्न पूछा था , " सर, कविता की पृष्ठभूमि तो लंका बतायी गयी है,कश्मीर कहाँ से आ गया ?"
" मैं जानता था कि तुम ऐसा ही कुछ पूछोगे..इस कविता का कश्मीर के साथ कोई संबंध नहीं है.." प्रोफेसर त्रिलोकी नाथ गंजू ने मेरी जिज्ञासा का शमन करते हुए कहा था,'राम की शक्ति पूजा '
को हमें इस दृष्टि से नहीं पढ़ना है। यह एक जानकारी मात्र है वैसी ही जैसे जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के बारे में ज्ञात होना चाहिए कि कामायनी 'कश्मीर शैवदर्शन' से प्रभावित है।''


।। महात्म्य का अध्ययन।।

मेरे आचार्य विषयांतर होने के मोह का संवरण न कर पाये थे और मुझे संदर्भित कविता में वर्णित शक्ति के कश्मीर में प्रचलित स्थानीय महात्म्य, उसके प्रादुर्भाव तथा उससे जुड़ी विपुल जानकारियों का भंडार मिला जिसका निराला की कृति 'राम की शक्ति पूजा ' से कोई लेना देना नहीं था,लेकिन मेरे साथ था।
मेरे आचार्य को कश्मीर की लोक संस्कृति ,भाषा, साहित्य, दर्शन,इतिहास और पुरातत्व सहित क्षेत्रसंपदा विषयक मेरी गहन रुचियों के बारे में पता था।इसलिए वह खाली समय में मुझे अपने कमरे में बुलाते।
यह जानकर मैं समृद्ध हुआ था कि प्रामाणिक इतिहास -ग्रंथों के अतिरिक्त महात्म्यों का अध्ययन हमें कश्मीर के
पुराख्यान, उसके प्राक् इतिहास ,
उसकी प्राचीन धार्मिक आस्था, स्थानों के प्राचीन नाम, लोक विश्वास, तीर्थों के पारंपरिक मार्ग तथा प्रचलित कर्मकांड आदि के उद्गगम और विकास का पता चलता है।
ये महात्म्य एक तरह से आध्यात्मिक विरसे के संदर्भ दस्तावेज़ हैं ।इनमें हमें प्राचीन कश्मीर की भू-राजनीतिक व्यवस्था,सभ्यतागत स्मृति,स्थानचेतना,
सामाजिक संरचना, इतिहास चेतना के साथ ही तत्कालीन भौगोलिक सीमाओं की भी जानकारी मिलती है।

घाटी में कश्मीरी पंडितों के सामूहिक निर्वासन वर्ष 1990 तक बावन प्रमुख तीर्थों के महात्म्यों कें उपलब्ध होने की बात कही जाती थी। भारतीय सभ्यतागत एकता के ये गैर पारंपरिक आधार स्रोत विद्वानों के अनुसार विगत डेढ़ हज़ार वर्ष में समय समय पर स्थानीय महात्म्यकारों ने संस्कृत में रचे बताए जाते हैं ।
इस पृष्ठभूमि में 'महाराज्ञी प्रादुर्भाव' विशुद्ध धार्मिक दृष्टि से लिखे होने के बावजूद कश्मीर के एक वृहद् मिथकीय संसार से हमें अवगत तो कराता ही कराता है,अन्य महत्त्वपूर्ण वस्तुसत्य से भी परिचय कराता है।


।। राम और कश्मीर ।।

ʼमहाराज्ञी प्रादुर्भाव' में जब देवी श्यामा रावण से रुष्ट हो जाती हैं, तब उन्हीं की इच्छा से राम उन्हें कश्मीर भेजते हैं ।इसका अर्थ है कि राम पहले से ही कश्मीर से भलीभाँति परिचित थे।कश्मीर गए भी होंगे।
चूँकि भरत का ननिहाल केकय जनपद में था।वह पिता दशरथ या माता केकयी अथवा भाई भरत के साथ एकाधिक बार तो गये ही होंगे । हालाँकि इसका उल्लेख वाल्मीकि ऋषि ने रामायण में नहीं किया है जो कथ्य की दृष्टि से आवश्यक भी न था।

केकय देश जाते हुए ,विष्णुधर्मोत्तर
पुराण (1.207.62-71), के अनुसार भरत वितस्ता (कश्मीर की नदी) पार करते हैं ।फिर सुदामा नदी के उस पार केकय पहुँचते हैं जिसकी राजधानी रामायण में राजगृह अथवा गिरिव्रज बताई गयी है।
ऐसी भी लोक मान्यता है कि जम्मू स्थित वर्तमान राजौरी ही केकय जनपद का राजगृह है।पाणिनि के अनुसार केकय शिबिपुत्र द्वारा निर्मित राज्य है जिसे व्यास नदी और गांधार का मध्यवर्ती अंचल बताया गया है।
भौगोलिक समीपता की दृष्टि से संभव है केकय के कश्मीर के साथ उसके भू-राजनीतिक संबंध रहे होंगे। जो भी हो,अयोध्यावासियों के लिए केकय जाने के लिए कश्मीर भी एक प्रमुख मार्ग रहा होगा ।
धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन की दृष्टि से कश्मीर घाटी में राम ,सीता और लक्ष्मण की स्मृति से जुड़े अनेक तीर्थ हैं।
लोलाब उपत्यका में एक पहाड़ पर 'राज़ॅ रामुन्य लॅअर 'अर्थात् राजा राम का भवन तथा समीप में सीताकुंड़ का होना एवं लोकभाषा में इंद्रधनुष को 'रामराम बद्रिन्य दून्य'(रामचंद्र का भद्र धनुष) कहना और आदर्श स्वरूप रामराज्य को 'रामुन राज' के रूप में याद करना महत्त्वपूर्ण संदर्भ -संकेत हैं।
म्मू-कश्मीर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 'रामबन' और 'रामसू' के अतिरिक्त बारामुला (संस्कृत वराहमूल) में 'गोसाऽन्य टेंग' (गोसाईं पर्वत) पर प्राचीन रामकुंड,लक्ष्मण कुंड का होना मुझे इसकी तह में जाने को प्रेरित करता है।

                                               

।। देवी का लंका त्याग ।।

महात्म्य में देवी को कश्मीर में प्रतिष्ठित करने के पीछे राम की भूमिका और एक पूर्व योजना दिखती है। मंदोदरी के अनुसार राम शुरू से ही देवी श्यामा के साधक थे।
युद्ध के आरम्भिक चरण में देवी श्यामा के पूजा मंडप में रावण आश्विन शुक्ला सप्तमी की मध्य रात्रि को राम के साथ एक सामरिक महत्व की कूटनीतिक बैठक बुलाता है। हालाँकि महात्म्य में इस प्रसंग को रावण की तंत्र साधना विधि से राम के प्राकट्य को एक रूपक के माध्यम से कहा गया है।
भेंट के दौरान रावण आपा खो देता है। राम को अपमानित करते हुए वह उससे तिरस्कार पूर्ण स्वर में धमकाता है कि वह सीता को भूलकर वापस अयोध्या लौट जाए और अपने प्राण बचाए ।
इसपर राम ललकार कर उसे चुनौती देते हैं :
" मैं देवी श्यामा की चरण पादुका को साक्षी रखकर तुमसे कहता हूँ कि पहले तुम्हारी लंका से देवी श्री श्यामा को सतीदेश कश्मीर में प्रतिष्ठित करूँगा। फिर तुम्हारा वध करके ,तुम्हारे भाई को सिंहासन पर बिठाकर सीता सहित अयोध्या लौटूंगा।"
(श्लोक- 61)

अर्थात् कश्मीर पहले से ही राम के दिमाग में था। तभी रावण के निर्बाध दुराचरण से तंग आकर तामसी रूप श्यामा लंका त्यागने की घोषणा करती हैं :
अहं व्रजामि मद्देशे
हिमाचले वरे शुभे ।
सती सरसि कश्मीर
वैष्णव व्रत धारिणी।।
( महाराज्ञी प्रादुर्भाव, श्लोक -2/59)
यह सुनते ही राम हनुमान को एकदम आदेश देते हैं कि वह देवी को अपने पीठासन पर धारण कर सुखपूर्वक कश्मीर ले जाए।
रावण के यहाँ यह सब सुरों में उत्तमा देवी महाश्यामा बलि में चढ़ाए गए मांस ,रक्त आदि का भक्षण करती थीं ।अतः 'घोरभक्षा' थीं ।कश्मीर पहुँचने पर राज्ञी कहलाईं...'राज्ञीति विश्रुता' ।
लंका से चलने पर देवी के साथ अनंतनाग सहित उसके 360 नाग भी साथ हो लेते हैं ।प्रश्न उठता है कि ये नाग कौन थे !
ऋषि पुलस्त्य के पौत्र रावण की कठोर तपस्या से अभिभूत श्यामा ने जब रावण के घर में निवास करने की उसकी प्रार्थना मान ली थी तो क्या ये नाग उसके साथ लंका गये थे ?अथवा वहाँ पहले से बंदी थे।क्योंकि रावण के बारे में रामायण में उल्लेख मिलता है कि उसने अनेक नाग कन्याओं का अपहरण किया था।
महात्म्य में देवी लंका से कश्मीर चले जाने की बात करते हुए कश्मीर को 'मद्देशे'(अपने देश ) कहती हैं ।कश्मीर नाग संस्कृति प्रधान अंचल रहा है। ऐसा क्यों न मान लिया जाए कि राज्ञा मूलतः एक नाग देवी हैं ।
'रामाज्ञानुकारिणी' देवी श्यामा लंका
में ही तामसी रूप का परित्याग कर हिमालय के एक प्रांगण में स्थित अपने मूल देश कश्मीर जाने को तैयार हो जाती हैं ।
ध्यातव्य है कि रावण ने अतीत में कठिन तपस्या के परिणाम स्वरूप अघोर रूपा श्यामा को प्रसन्न कर अपने घर (लंका ) में निवास करने को राज़ी कर लिया था।


।। वायु मार्ग से कश्मीर प्रवेश ।।

लंका में युद्धरत राम हनुमान को निर्देश देते हैं कि वह अपनी पीठ पर देवी को अनंतनाग सहित 360 प्रमुख के साथ सतीदेश कश्मीर ले जाए।
राम हनुमान को जिस सहजता के साथ देवी को कश्मीर लेकर जाने की बात करते हैं उससे लगता है कि राम को कश्मीर की भौगोलिक स्थिति तथा वहाँ तक की दूरी सब कुछ मालूम है।
महात्म्य में लंका से कश्मीर तक के वायुमार्ग या वायुयात्रा का उल्लेख नहीं है।सीधे कश्मीर के दक्षिणी छोर पर हिमालय के पाँचाल पर्वत के ऊपर से प्रवेश होता है जो कश्मीरी में 'पाँच़ाल दअॅर' अर्थात् 'पाँच़ाल धारा' कहलाती है। इससे यह भी पता चलता है कि वर्तमान बानिहाल (सं.वनशाला) मार्ग से पूर्व अतीत में कश्मीर प्रवेश का यह भी मार्ग रहा है। क्षेमेंद्र और कल्हण ने ' पाँचाल धारा' का उल्लेख किया है।इस पर प्रसिद्ध विद्वान प्रो. काशी नाथ धर ने विस्तार से लिखा है।उनके अनुसार इसी पथ को मुगलों ने 16वीं -17 वीं शताब्दी में कश्मीर जाने का राजमार्ग बनाया जिसे आज मुगल रोड कहते हैं ।
'पाँचाल धारा' से महाराज्ञी वर्तमान तुलमुल में विराजमान होने से पहले कश्मीर घाटी में आकाश मार्ग से जिन जिन सुरम्य स्थलों पर उतरीं और रुकीं इसका श्लोक 34 से श्लोक 44 तक विस्तृत वर्णन मिलता है।स्थान- चेतना के अध्ययन की दृष्टि से यह बहुत रोचक यात्रा- वृतांत है।
पूरी कश्मीर घाटी की तत्कालीन भौगोलिक सीमाओं के भीतर भीतर देवी को पीठासन पर बिठाए हनुमान वर्तमान शुपयन, कुलगाम,अनंतनाग,श्रीनगर,
बड़गाम,बारामुला,कुपवारा,शारदा पर्वत,
प्रयाग शादीपुरा और अंत में मौजूदा तुलमुल ले आते हैं ।

भू-राजनीतिक अथवा प्रशासनिक इकाइयों की दृष्टि से देखें तो प्राचीनकाल मे विजयक्षेत्र(अनंतनाग),ज्येष्ठरुद्र क्षेत्र (श्रीनगर ),वराहक्षेत्र (बारामुला और पाक अधिकृत मुज़फराबाद ) और नन्दीक्षेत्र (हरमुख-सोनमर्ग-बांडीपुर आदि) के ऊपर से महात्म्यकार हमें घाटी का विहंगम दर्शन कराता है।
कश्मीर की ये प्राचीन धार्मिक -साँस्कृतिक इकाइयाँ ही बाद में 'क्रमराज' अथवा 'कमराज़'
( पुराना बारामुला ज़िला), 'मड़वराज' अथवा 'मराज़'(पुराना अनंतनाग ज़िला)
में बदले। यहाँ यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि घाटी से बाहर वर्तमान बानिहाल,रामबन आदि सुदूर क्षेत्र 'सिराज' कहलाता है। श्रीनगर को मराज़ तथा कमराज़ निवासी ग्रामीणों द्वारा दबी दबी ज़बान में 'यमराज़' कहने की भी परंपरा है।


।। देवी के तीर्थ ।।

आज वे सभी स्थल जहाँ जहाँ महात्म्य के अनुसार हनुमान ने देवी को विश्राम कराया, महाराज्ञी के तीर्थ हैं।
पंचाल पर्वत को लांघकर देवी पहले शुपयन में प्रसिद्ध 'कपाल मोचन तीर्थ ' पर उतरीं। फिर विष्णुपाद क्रमसर नाग (कौंसरनाग) तीर्थ को देखा।आगे बढ़ीं।ध्यातव्य है कि सतीसर के आख्यान से जुड़ी 5 किलोमीटर लंबी और 2.5 किलोमीटर चौड़ी विष्णुपाद कौंसरनाग एक सुरम्य पर्वतीय तीर्थ है जिसके विषय में 'नीलमतपुराण' में विशद वर्णन मिलता है।
यहाँ से देवी 'मध्यग्राम' (मंज़गाम) में उतरीं।यह पर्वतीय ढलान पर स्थित होने से नुकीले पत्थरों से ढका देखा। आगे बढीं।
फिर आगे 'विष्णुगंगा' यानी विशोका (वेशव) के तट पर 'दिवस्थली' (दिवसर) गयीं। फिर 'खल्वारणी'(खनबरनी) पहुँचीं। यहां तक आते आते पता नहीं कैसे महात्म्यकार कुलगाम स्थित आराध्य कुलवागीश्वरी के तीर्थ का उल्लेख करना भूल गये !
ऊपर्युक्त सभी स्थान स्थायी निवास के लिए मुनासिब न पाकर यहाँ से देवी को हनुमान उत्तर दिशा में मार्तंड तीर्थ के समीप पूर्व में लघुपुर' (ल्वगुर्य पुर) लेकर जाते हैं ।
यहाँ से अनंतनाग के पास जो आज 'देवीबल' तीर्थ है, विश्रांत देवी वहाँ कुछ देर रुकीं। तत्पश्चात यहाँ से 'लोकपुर'
(वर्तमान लोक भवन जिसे कल्हण ने 'लोकपुण्य'कहा है) और उसके बाद हनुमान के कंधे पर सवार देवी पहले 'रायस्थल'(रायथन,नागाम) पहुँचती हैं फिर 'वादिपुर' (चाडुरा स्थित बाॅद्यपुर) ।
यहाँ से कोटितीर्थ'( बारामुला) पहुँचने के बाद के बाद 'चण्डपुर' (चंडीगाम),फिर 'टंककर'(वर्तमान टिक्कर) के बाद देवी शारदा (मौजूदा पाक अधिकृत क्षेत्र ) पर्वत से वापस मुड़कर प्रयाग तीर्थ (वितस्ता और सिंधु का संगम स्थल , शादीपुर ) के समीपवर्ती वर्तमान तुलमुल में उतरकर स्थायी तौर पर वास करती हैं ।
चारों ओर से सिंधु कुल्या से आवृत और सघन छायादार वृक्षों (बून्य अथवा चिनार) से सुशोभित यह दलदल स्थान ,जो रूई जैसा नरम और मनोहारी था। देवी को अपने 360 जलु-व्यालों के रहने के लिए भी उपयुक्त जान पड़ा ।यह स्थान 'हरमुख' (शिखर ) की तलहटी और 'भाग' सहित 'लाब्धवन'(लोदवुन) से घिरा सुरम्य स्थल था।
लोकमान्यता है कि हरमुकुट गिरि अथवा हरमुख की जहाँ तक दृष्टि जाती है अर्थात् उसकी तुलमुल तक की परिधि में नाग विषहीन हो जाते हैं । केवल लार परगना अपवाद है जहाँ की गोनसी भयानक विषैली बताई जाती है।कहावत है-"हारिच गाड तॅ लारिच गुनस !"अर्थात् आषाढ़ में मछली खाना और लार की गोनसी दोनों मारक हैं ।
महात्म्य में इसे 'तूलमूल्यक' अर्थात् रूई समान नरम कहा गया है। दलदल होने से अनुपजाऊ थी यह जगह।अतः ज़्यादा मूल्य की भी न थी।कल्हण ने भी राजतरंगिणि (तरंग 5,श्लोक 39) में तुलमूल्य (तुलमुल) का उल्लेख किया है।यहाँ के ब्राह्मणों ने राजा जयापीड़ की अतियों के विरोध में 'प्रायोपवेश'
(अनशन) किया था। अबुल फज़ल ने भी 'आइने अकबरी' में तुलमुल का उल्लेख किया है। महात्म्य में चंदपुर (हारवन,श्रीनगर ) की भुवनेश्वरी तीर्थ का उल्लेख करना महात्म्यकार से छूट गया लगता है।

लोकमान्यता के अनुसार यहाँ भी महाराज्ञी का तीर्थ है।इसी तरह यारीपोरा चौक (कुलगाम) में आज जो मस्जिद खड़ी है वह भी कभी अतीत में महाराज्ञी का देवस्थान रहा है।यह जानकारी मुझे यारीपोरा के उसकी आस्थान के एक मुस्लिम दुकानदार ने स्वयं दी थी, "हमने बुज़ुर्गों से सुना है कि यहाँ कभी तुलमुल की 'मोज भगवती'(माँ भगवती) का आस्तान था"

।। महात्मय का संदर्भ ।।

कश्मीर की प्रमुख स्थानीय आराध्य देवियाँ इस तरह हैं :
शारदा (पाक अधिकृत कश्मीर ),
शारिका (हारी पर्वत,श्रीनगर ),
बाला (बालहोम,पाँम्पोर),
ज्वाला (ख्रिव,पुलवामा),
व्रीडा (पुलवामा)
भद्रकाली (हंदवारा),
भर्गशिखा (मट्टन,अनंतनाग )
उमा (ब्रारि आंगन,उमानगरी)
भुवनेश्वरी (चंदपुरा,हारवन)।
कुलवागीश्वरी (कुलगाम)
शैलपुत्री (बारामुला)
भट्टारिका (ब्रारि माॅअज )

इनमें तुलमुल की महाराज्ञी का स्थान सर्वोपरि है।इन्हें कश्मीर की प्रमुख अधिष्ठात्रि देवी मानने वाले लोग भी हैं और इनके स्थान पर श्रीनगर स्थित हारी पर्वत की आराध्य देवी ' श्री शारिका' को ही प्रमुख अधिष्ठात्रि भी मानने की परंपरा है।महात्म्य के श्लोक 5 की पाद टिप्पणी में प्रोफेसर काशी नाथ धर के अनुसार , "स्पष्ट है कि महाराज्ञी का देवी -स्वरूप काश्मीर मूलक नहीं, जबकि देवी का शारिका रूप ही कश्मीर की प्राचीन सनातन परंपरा से संबद्ध है।"
देवी के तुलमुल स्थित जलकुंड के आकार के अनुरूप लोक ने इसकी तुलना 'जप कुत्थिका' (कश्मीरी में 'ज़प कोथुज') अर्थात् जपमाला की कुत्थिका के साथ दी है।यानी प्रकारंतर से इसे जपयोग साधना का तीर्थ कहा गया है।
वह कश्मीर में सौम्य रूप धारण करती हैं । शुद्ध सात्विक और राजसिक गुणों के प्रधान्य के कारण महाराज्ञी की यहाँ खीर ,दूध ,मिष्ठान आदि में इनकी प्रीति बताई गई है।
अत्रस्थिताभूच्छान्ता
सा क्षीर
खण्डाज्यभोजना।
सात्विक सत्वरूपा सा
देवी पंचदशाक्षरी ।।
(महाराज्ञी प्रादुर्भाव,श्लोक-49)
तंत्र विधि से पूजित अन्य देवियों की तरह यहाँ बलि की प्रथा नहीं । देखा जाए तो कश्मीर की सभी आराध्य देवियों में यही एकमात्र देवी हैं जो वैष्णव हैं ।शेष ऊपरयुक्त सभी देवियों तथा स्थानीय भैरवों को परंपरा से तहरी (पीले चावल) और च़रवन (कलेजी) का भोग चढ़ता रहा है।
दुनिया जानती है कि भौगोलिक कारणों के अलावा परंपरा से शाक्तमत की तंत्र साधना पद्धति के प्रचलन में रहने के कारण आम कश्मीरी हिन्दू मांसाहारी होते हैं ।
आज भी कोई भी कश्मीरी हिंदु अपवाद छोड़कर,चाहे वह जहाँ भी हो, हर महीने की शुक्ला अष्टमी को मांस का सेवन कदापि नहीं करेगा। यह महाराज्ञी के प्रति उनकी अकूत आस्था और श्रद्धा है।निर्वासन में भी माताएँ रोज़गार के चलते देश के अलग अलग राज्यों या विदेशों में गये अपने बच्चों को फोन पर अष्टमी के दिन मांस न खाने की हिदायत देना नहीं भूलतीं।
लगता है कि कश्मीर में वैष्णव विमर्श के विकास की दृष्टि से 'महाराज्ञी प्रादुर्भाव' में वर्णित महाराज्ञी का आगमन भी एक बड़ी घटना है।
हालाँकि महाराज्ञी आगमन के पूर्ववर्ती काल में 'नीलमतपुराण' के अनुसारकश्यप ऋषि की प्रार्थना पर जलोद्भव दैत्य का वध करने के लिए देवताओं की सेना के साथ विष्णु भी कश्मीर चले आए थे और उनके ही आदेश पर अनन्त ने वराहमूल (वर्तमान बारामुला) के पास सतीसर का एक पर्वत काटा था। जलराशि निकाल दैत्य का वध विष्णु ने किया था । विष्णुपाद कौंसरनाग तीर्थ इसी आख्यान से संबद्ध है।

।। जलकुंड का रंग बदलना ।।

इस तीर्थ के कुंड के जल का रंग अक्सर बदलता रहता है।कभी इसका जल काला,कभी लाल,गुलाबी,हरा,दूधिया,नीला हो जाता है ।
महात्म्यकार ने 'नानावर्णैर्र-अलंकृता'
(श्लोक 45) कहकर इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है।

विज्ञान इसका कारण कुंड के उष्ण या शीतल जल में माइक्रोबस् के घटने या बढ़ने को मानता है। पर कश्मीरी लोकमानस इन बदलते रंगों को शुभ अशुभ घटनाओं की पूर्व चेतावनी के रूप में लेता है ।
सन् 1886 में ब्रिटिश सेटलमेंट आयुक्त वाल्टर लारैंस ने खीरभवानी के जलकुंड में बैंगनी रंग देखा बताया है । स्वामी विवेकानंद ने भी रंग बदलना देखा बताया है ।
स्वामी विवेकानंद ने खीरभवानी तीर्थ की जीर्ण- क्षीर्ण अवस्था देखकर मन बनाया था। कहते हैं देवी ने उसे ध्यान में लताड़ लगाई थी कि तुम मेरा उद्धार करने वाले कौन होते हो!

।। फिर जलमग्न हुआ तीर्थ ।।

किंवदंती है कि अतिवृष्टि और बाढ़ के कारण यह तीर्थ काफी वर्ष जलमग्न रहा ।एक दिन बोहरीकदल (श्रीनगर ) के संत कृष्ण जू टपिलू को सपने में निर्देश दिया कि कल गांधरबल से नौका में बैठकर मेरे पास आए। नौका के आगे आगे एक नाग ने मार्गदर्शन किया।जहाँ पर नाग ने अपना फण ऊपर उठाकर डुबकी मारी और गायब हो गया, वही देवी स्थल था।यह तीर्थ की फिर से खोज थी।
खीरभवानी के जलकुंड में आज जो संगमरमर का भव्य मंदिर खड़ा है, वो डोगरा नरेश महाराजा प्रताप सिंह ने सन् 1920 में बनवाया है ।

।। निर्वासन में खीरभवानी ।।

कश्मीरी पंडित विश्व में कहीं भी हों वे खीरभवानी को कभी भी और कहीं भी नहीं भूलते। सन् 1990 में जेहादियों द्वारा जलावतनी में धकेल दिए जाने के बाद उन्होंने भवानीनगर ( जम्मू ), शरणार्थी-कैम्प जगती ( जम्मू) और दिल्ली एनसीआर में तीन जगह भव्य खीरभवानी मंदिर बनाए ।

इसके बावजूद हज़ारों कश्मीरी निर्वासित जनता हर वर्ष जान की बाज़ी लगाकर ज्येष्ठ शुक्ला अष्टमी को तुलमुल कश्मीर जाते ही जाते हैं।

(छायाचित्र : श्री किरण वातल के सौजन्य से)

Dr. Agni Shekhar

Poet , Writer, Activist in Exile

DURGA NAG MANDIR SRINAGAR , KASHMIR

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