हरमुख कोई मेरे साथ चले ! || by Dr. Agni Shekhar || LIVE IMAGE


बात सितंबर 2013 की एक सुबह की है।मेरे मित्र संजय मोज़ा ने आग्रहपूर्वक मुझसे कहा कि आप मान जाइए , हम कल चुपके से अपनी कार में कश्मीर के लिए चल पड़ते हैं। हम भी हरमुकुट यात्रा में शामिल होंगे।

 संजय मोज़ा को पता था कि मैं उसकी तरह ही एडवेंचर प्रिय रहा हूँ।और कश्मीर के जिहादी आतंकवादियों के हिटलिस्ट पर होने के बावजूद जोखिम उठाने के मोह का संवरण न कर पाऊँगा। 

नब्बे के दशक में हुए हमारे जीनोसाइड  और सामूहिक जलावतनी के बरसों बाद एक जाँबाज़ निर्वासित युवक विनोद पंडित ने सेना के सहयोग से हरमुख यात्रा फिर से आतंकियों से लगभग मुक्त पथ से शुरु की थी। 

सेना और राज्य के संबंधित अधिकारियों ने उसे यात्रा के पारंपरिक पहाड़ी-मार्ग वुसन  से जाने की अनुमति नहीं दी थी इस मार्ग में ऊपर ऊपर जाने पर सघन वनों और पहाडी खाइयों में पाकिस्तान से प्रशिक्षण कर के आए आतंकवादियों के ठिकानों के होने की उन्हें सूचनाएं थीं।

 मैंने संजय मोज़ा को हाँ कर दी।

दूसरे दिन हम जम्मू से सुबह चल दिए ।

अपने पाठकों के लिए यहाँ प्रसंगवश बताता चलूं कि कश्मीर के हालात , जेनोसाइड और अलगाववादियों व आतंकवादियों के कारनामों को देश -विदेश में  बेखौफ होकर बोलने और लाखों निर्वासित कश्मीरी पंडितों के साथ खड़ा होने के अपराध के लिए मैं उनकी आँख की किरकिरी था इसलिए उनकी हिटलिस्ट पर था।मुझपर जम्मू में भी दो बार हमले हुए थे।

 मैं इससे पहले कश्मीर के दिनों में दो-तीन बार तीन भिन्न मार्गों से हरमुख जा चुका था।

एकबार सन् 1983 में अपने पर्वतारोही मित्रों के कहने पर बुखार से जूझ रही अवस्था में ही तैयार हो गया था।उसबार हमने सोनमर्ग से जाना तय किया था और मुझे बीच रास्ते से ही वापस लौटकर आना पड़ा था। मेरी हालत खराब हो गयी थी।

अगले वर्ष मैं एक अन्य पर्वतारोही दल के साथ इसी रूट से होकर वाँगथ कंगन से लौटा था। इससे भी वर्षो पूर्व हमने यह यात्रा बाँडीपुर के दुर्गम पहाड़ी-

मार्ग से करनी चाही थी पर खराब मौसम ने हमें जानलेवा जोखिम उठाने से रोक दिया था। बहुत सुना था कि जोखिम भरा दुर्गम पहाड़ी-मार्ग है जो त्रिसंगम से लोलग्वल से हरमुख को जाता है। 

संजय मोज़ा आराम से कार चलाते हुए अपने बीते दिनों के एडवेंचर के अनकहे अनुभव सुना रहा था। हम दो बजे श्रीनगर पहुँचने वाले थे।

 इस यात्रा के संयोजक विनोद पंडिता के साथ जाने वाले यात्री डल झील के किनारे ज़ीठ्ययार (ज्येष्ठेश्वर) में रुके थे और दूसरे दिन वहाँ से सुरक्षाबलों की देखरेख में नारान नाग, कंगन के लिए निकलना था। वास्तव में यह पारंपरिक यात्रा का वापसी का रूट था जो मेरा पहले का देखा हुआ था।

मुझे इस बात की अतिरिक्त प्रसन्नता थी कि इस वर्ष के यात्री दल में अबकी बार मेरे कुछ युवा साथी भी  देश के सुदूर राज्यों से भी चले आए थे। पुणे से राहुल कौल , वृषाली ,दिल्ली से विट्ठल चौधुरी , सुशील पंडित, रषनीक और सुनील रैना राजानक ।

पूर्व में हरमुख यात्रा के मेरे अनुभव काफी रोमांचक थे जो मैंने रास्ते में संजय मोज़ा को सुनाए ।

सोनमर्ग के रास्ते यह यात्रा मैंने 1988 में अशोक हकीम,राजेश गगरू,जयकिशन,शिबन सुल्तान, कौल साहब और सलमान के साथ की थी।इस रूट में विष्णुसर, गाडसर (गरूड सर), कृष्णसर, यमसर आदि अलग अलग रंगों के अनेक मनोहारी सरोवर पड़ते हैं जिनके अपने उपाख्यान थे जो अब लगभग लोकस्मृति से उतर चुके थे।

यहाँ पहले पड़ाव पर जहाँ हमने रात गुज़ारनी थी सहसा हम सबको ऐसा लगने लगा था कि रास्ते  में जो स्थानीय मुस्लिम चरवाहे हमें मिले वो हमें विचित्र नज़रों से देख रहे थे। ये पहाड़ी-मार्ग आतंकियों की पनाहगाह हो सकते हैं और सम्भव है इन्हें उनकी जानकारी भी हो ; और यह राजनीतिक हालात के चलते हमारी अतिरिक्त संवेदनशीलता या शंकालु मनस्थिति भी हो सकती थी।

जो भी हो , सबने सुरक्षा की दृष्टि से मेरा नाम पुलिस एस.पी. युसुफ साहब रखा जो स्थानीय युवाओं को पहाड़ी पुलिस दल बनाने के लिए सर्वे पर इधर आए हैं।उन दिनों मेरी कतरी हुई  जमाते इस्लामी के युवकों जैसी दाढ़ी भी  हुआ करती थी। इसलिए इस छलिया रूप से हमें सहानुभूति का लाभ हुआ था। बात दूर दूर तक फैल गई थी । 

यह कश्मीर में अलगाववादी सशस्त्र आतंकवाद की चुप तैयारी के दिन थे। ज़रूर स्थानीय पहाड़ी चरवाहों को यह लगा होगा कि हम दरअसल पाकिस्तानी आतंकी दल होंगे जो हिंदु वेश में इधर यात्रा के बहाने घूम रहा है।

संजय यह अनुभव सुनकर मुझे कुछ देर भय मिश्रित नज़रों से देखता रहा। फिर उसने बताया कि वह इस दुर्गम और रोमांचक पहाड़ी यात्रा का फिल्मांकन करेगा और बाद में मैं उसकी पटकथा लिखूंगा। 

 हमने दूसरे दिन कार ज़ीठयार ( ज्येष्ठेश्वर) में रखी और यात्री दल के साथ उनकी बस में सवार हुए।साथ में पुलिस के कुछ सुरक्षाकर्मी भी बस में चढ़े।

।। हरमुख का उपाख्यान।।

एकबार माँ पार्वती की समाधि टूटी । उसने देखा शिव नहीं थे आसपास। 

कहाँ गये होंगे ?

वह विकल होकर उन्हें ढूँढने लगी। लेकिन शिव नहीं मिले।

वह विरहन की तरह उन्हें वितस्ता किनारे किनारे ढूँढती भागी।वह प्रयाग ( वर्तमान शादीपुर, कश्मीर) के संगम तक पहुँचीं।

यहाँ से माँ पार्वती ने सोचा क्यों न हरमुख जाया जाये..शिव एकांत प्रिय हैं. सम्भव है वहीं समाधिस्थ हों। 

वह अनेक गाँवों, तीर्थों से , नदियों , नागों ( जलकुंडों) से होते हुए उनसे शिव के बारे में पूछती हुई हरमुख की ओर बढ़ी।

उसने गाँधरबल के नुनर गाँव से आगे वुसन के पारंपरिक पथ से जाने का निर्णय लिया। वुसन से आगे वन्य पुष्पों और वृक्षों के उद्यानों से होते हुए वह 'रामरादन ' पहुँचीं। यह वह स्थान है जहाँ कठिन तपस्या करते मूर्छित हुए अपने भाई भरत के जीवादान हेतु राम ने शिव की आराधना की थी। एक अन्य कथा के मुताबिक यहां धनुषभंग के बाद परशुराम ने शिव से पुनः शक्ति प्राप्ति के लिए आराधन किया है।इससे इस स्थान का नाम रामरादन है। यहीं पर प्राचीन शिव मुष्ठगिरि स्थान है जहाँ परशुराम का निवास रहा है।आगे मुंड पृष्ठगिरि है जहाँ शिलाद मुनि को एक शिला तोडते हुए एक दिन रुपहली कांति का स्वयंभू पुत्र-रत्न मिला था जो नन्दि कहलाया।

आगे आगे चलते हुए माँ पार्वती भरतबाल (प्राचीन भरतगिरि) की चढ़ाई करने लगी।यहां अखरोटों के पेड़ बहुतायत में होते हैं। आगे भुर्ज के भी वृक्ष मिलते हैं। यहाँ से कुछ ऊपर माॅलिश नामक एक सुन्दर चारागाह वह थककर पहुँची होंगी ।

यहाँ से आगे 13,469 फीट की ऊँचाई पर  'हंसद्वार ' के दामन में ' ब्रह्मसर' है । 'हंसद्वार' में ब्रह्मा हंस के रूप में अवतरित हुए थे।

यहाँ से आगे 'बरनिबल' नामक दरे से होते हुए एक स्थान पर उसे पूछने पर किसी ने बताया,"नहीं मैंने शिव को यहाँ से जाते नहीं देखा।"

 पार्वती के नेत्र से एक आँसु ढुलककर नीचे गिरा जो कालांतर में 'द्वख फ्योर ' ( दुख की अश्रुबूंद नामक ठंडा जलकुंड)कहलाया और जहाँ पर किसी ने बताया कि हाँ, उन्होंने शिव को यहाँ से होकर आगे जाते देखा है , वहाँ पर आज " स्वख फ्योर " (सुख की अश्रुबूंद नामक गुनगुना पवित्र जलकुंड) है।

इस तरह माता पार्वती दुर्गम पहाड़ों का चप्पा-चप्पा छान मारते हुए सभी  पवित्र पड़ावों पर रुकते फिर आगे बढ़ती रही होगी।

और यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर आगे गहन गम्भीर 'कालसर' अथवा कलोदक है जिसमें मनौती पूर्ण होने के लिए तीर्थयात्री तांबे का सिक्का श्रद्धापूर्वक फेंकते हैं। किंवदन्ती है कि यहाँ दत्तात्रेय ऋषि ने दीर्घकाल तक शिव की तपस्या की थी। मान्यतः यह भी है कि बालक नन्दि ने यहीं जल में  खड़े होकर सौ वर्ष पर्यन्त शिव की तपस्या की थी जिससे इस सरोवर के एक भाग का नाम नन्दक्वल ( नन्दी कुल्या) भी पड़ा ।

इसी के पश्चिमी कोने में 'चाँग्य नाग' अर्थात् दीपकुंड है ।कहते हैं पूर्वकाल में यहाँ माता ने  हरमुख की तलहटी में कहीं तप करने हेतु कोई जगह ढूँढने के लिए  काल नामक एक गण को भेजा था । गण ने माँ से झूठ कहा कि उसे वहाँ ऐसी कोई जगह न मिली।इस पर माँ ने स्वयं यहाँ आकर यह पश्चिमी कोने में दिये के आकार के नाग ( कुंड) का चयन किया और गण को बाती की तरह यहाँ सूखकर दुर्बल होने का शाप भी दिया।

मान्यता है शिव को ढूँढते हुए यहाँ पहुचने पर पार्वती ने अपने तप का एक अंश कालसर में अर्पण किया। इस कलोदक के नीलवर्णी भीतरी भाग को काल शिव की तपस्थली और उसके बाहरी भाग के हल्के हरे जल को नन्दि की तपस्थली होने की मान्यता है।

यहाँ से आगे 'दान्द लोट' ( प्राचीन नन्दीपुच्छ) को पार करते ही 'नुन्दक्वल' (नन्दि कुल्या) से उसने 16,872 फीट की ऊँचाई पर स्थित हरमुख शिखर की ओर कैसे देखा होगा ,मैंने कथा के धरातल पर खड़े होकर कल्पना की।

हरमुख के उत्तुंग और सुरम्य एकांत में उसने शिव को गंगा के साथ क्रीड़ारत देखा।उसे क्रोध मिश्रित आश्चर्य हुआ।

सामने पार्वती को देख गंगा भी अचकचा गयीं। वह शिव की जटाओं से नज़र बचाकर कुछ धारों के रूप में नीचे गिरीं और पतनोन्मुखी होकर बहने लगीं।

इससे उसका नाम 'हरमुकुट गंगा' पड़ा।

पार्वती ने क्रोधित होकर गंगा को 

पुनः वापस न आ पाने का शाप दिया। शिव तो संकोच और ग्लानि में थे ही। उन्होंने पार्वती का क्रोध शमित कर उन्हें संतुष्ट कर लिया।

इस हरमुख का महात्म्य मुझे एक पर्वतारोही और एक कवि के तौर पर  बहुत प्रेरित करता रहा है।यह जो ऊपर मैंने आपसे उपाख्यान साझा किया ,इसमें विस्तार देने के आशय से एक कवि के नाते मेरी कल्पना का भी अंश सम्मिलित है।

इस कथा को किसी साहित्यिक विधा में  प्रयोग करने की मेरी योजना है।यह उपाख्यान मैंने ऋषिकेश में आयोजित एक सांस्कृतिक सेमिनार में 'कश्मीर की लोकवार्ता  में गंगा' विषय पर बोलते हुए जब अपने भाषण में पिरोकर सामने रखा तो वहाँ सम्मानित श्रोताओं में ओडिषी और मोहिनीयट्टम की दो सुप्रसिद्ध नृत्यांगनाओं कविता द्विवेदी और मोम गाँगुली भट्टाचार्य ने मुझे विशेष धन्यवाद दिया। कविता द्विवेदी इतनी अभिभूत हुईं कि वह कभी इस आख्यान पर ओडिषी नृत्य करके रहेंगी।

।। एक कश्मीरी लीला-कविता  का साक्ष्य।।

यह कथा एक लोकप्रिय कश्मीरी लीला(काव्य रचना ) में भी वर्णित है :

  " वन्दयो म्वन्य बु पादन 

    छाँडथो  रामरादन "

अर्थात् मैं तुम पर अपने नेत्र न्यौछावर करूंगी, तुम मुझे मिला तो सही। मैं रामरादन ( परशुराम ने जहाँ आराधना की थी) में खोजूँगी तुम्हें। 

इस लोकप्रिय कश्मीरी लीला-रचना में हरमुख यात्रा के वे सभी पड़ाव मिलते हैं जिनसे होकर तीर्थयात्रियों को पर्वतारोहण करना होता है।

साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए यह भक्ति काव्य स्थान- चेतना का एक अन्य बेहतरीन उदाहरण है।

सोनमर्ग के रास्ते पर कंगन से आगे नारान नाग में रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह हमने दुर्गम बुथ्यश्वर (पौराणिक भूतेश्वर गिरि) की चढ़ाई शुरू की । यात्रा का संयोजक विनोद पंडित अपने दो अन्य साथियों को लेकर घोड़े पर सवार होकर अगले दस्ते के तौर पर कूच कर गया था।

वाँगथ में स्थित नारान नाग ( नारायण नाग) के दोनों ओर सघन वन और गंगबल से कल कल करती बहकर आती क्रेंकनदी ( पौराणिक कनकवाहिनी ) , जंगली विहग- पखेरू, ललितादित्य के बनाये धरोहर मंदिरों के भग्नावशेष, योगवसिष्ठ के रचनाकार ऋषि वसिष्ठ के आश्रम, भूतेश्वर व भरतगिरि के तीर्थों से भरे रहने की सभ्यतागत स्मृति अवशेष, राजा जलौक और उससे जुड़ी पुरा कथाएं, उनका ज्येष्ठरुद्र को श्रीनगर में स्थापित करना ,सोदरतीर्थ (सोदरनाग) का वहाँ प्रकट होना आदि मुझे बार बार हाँट किए जा रहा था । 

मुझे क्षमा कौल की यह बात बार बार याद आ रही थी कि हो न हो इसी नन्दिक्षेत्र में  कश्मीर में मानव की प्रथम सृष्टि हुई है। इससे मुझे वो मान्यता याद हो आयी कि यहीं 'प्रंग' वो स्थान है जहाँ शिला पर बैठ कश्यप ऋषि पौराणिक सतीसर के जल निकासी का दृश्य देखने बैठे थे।

उसने कल्हण की राजतरंगिणि और डाॅ रघुनाथ सिंह का अनुवाद  दो एक वर्ष लगाकर अध्ययन किया है। मैंने तय किया इस यात्रा से लौटकर मैं उसे यह सब वरीयता से लिखने को कहूंगा।

यह 'नाराननाग' वही सुरम्य पर्वतीय सुरम्य वन प्रदेश था जहाँ 12वीं शती में परिहासपुर ( पटन) से चलकर इतिहासकार कल्हण ने दो वर्ष का वानप्रस्थ लेकर अपनी कालजयी राजतरंगिणि की रचना की थी। 

 यहां हम पिछली बार दो दिन तक टैंट लगाकर रुके थे।तब हमे यह देखकर दुख हुआ था कि आसपास के स्थानीय लोग यहाँ नारान नाग के भग्नावशेषों से मूर्तियां उखाड़कर बेचने के लिए इच्छुक ग्राहकों को टोहते थे।

यह मूर्तिचोर नये भडुए थे।

 यह अंचल कश्मीर के प्राचीन नन्दिक्षेत्र में पड़ता था। आज कितने लोग जानते हैं प्राचीन काल में कश्मीर में नन्दिक्षेत्र, वराहक्षेत्र,ज्येष्ठेश्वर क्षेत्र, विजयेश्वर क्षेत्र, भृगुक्षेत्र,हर क्षेत्र आदि इस तरह के भू-राजनीतिक जनपद हुआ करते थे।

कोई सांस फूले बिना बुथ्यश्वर (भूतेश्वर गिरि) कैसे चढ़ सकता है! सब यात्री अभी से थके कदमों से लंबी सांस छोड़ छोड़कर आहिस्ता से इस पर्वत की खड़ी चढ़ाई चढ़ रहे थे। 

 मैंने संजय मोज़ा के साथ चल रहे भारी शरीरयष्टि वाले युवा विट्ठल चौधुरी को लोकप्रचलित कहावत सुनाकर उसे उत्साहित किया ," हमारी क्या बिसात है , कहते हैं..बुथ्यश्वर खसान छि सुहन ति दितिमुत्य दह थख...

यानी भूतेश्वर गिरि की चढाई करते तो शेर भी दस बार थका है।"

 थकान से उनके लाल हुए चेहरों पर मुस्कान फैल गयी । मेरे साथ साथ जो कश्मीरी पुलिसकर्मी चल रहे थे उन्हें भी हँसी आई। 

वे लोग अब तक मुझसे बातचीत करते घुलमिल गये थे। वे हैरान थे मेरी गाँव-गाँव की जानकारी से। वे लोग कश्मीर के जिस जिस गांव के थे मैं उन गांवों को जानता ही नहीं , बल्कि वहां कश्मीरी कहावतें , मुहावरे और लोक विश्वास संकलित करने के सिलसिले में गया भी था। मैं कश्मीर का लगभग चप्पा चप्पा घूमा यायावर हूँ , उन्हें यह क्या पता था !

पांच छह घंटे के पर्वतारोहण के बाद हम खुले मैदान में आ गये थे ।यह हरा भरा मैदान था।ऊपर  आकाश में कहीं कहीं मेघ थे। कुछ ही दूर चलने के बाद आकाश को जैसे पूरी तरह मेघाच्छादित होने की सुध आई हो । हवा ने कानाफूसी की कि सम्भलो अभी मेघ बरसेंगे। 

हुआ भी ऐसा ही। प्रकृति मनुष्य से ऐसे ही संवाद करती है पहाड़ी यात्रा में। हमें सेना के एक कैंप में रात गुज़ारनी थी। उन्हें संबंधित अधिकारियों ने अग्रिम सूचना दे रखी थी।

हमारे वहाँ पहुँचने पर झमाझम वर्षा हुई।वहाँ तैनात संवेदनशील सैनिकों ने हम सब को गर्म जैकेट, कंबलें दीं।चाय पिलाई।गर्म गर्म दाल रोटी खिलाई। उनकी सेवा भावना से हम अभिभूत थे ।सहसा मुझे साहित्यकार मित्र गौतम राजर्षि की याद आई जो मेरी सूचना के अनुसार कुछ समय पहले तक इसी इलाके में ड्यूटी पर तैनात थे  और  सेना को दानवी रूप में आए दिन पेश करने वाले तथाकथित कश्मीरी मानवाधिकारवादियों का कच्चा चिट्ठा जानते थे। उसने एकबार मुझे कश्मीर केवऐसे ही एक परिचित कवि का कच्चा चिट्ठा बताते हुए कहा था कि वह सेना विरोधी तथाकथित प्रगतिशील रचनाकार कैसे सेना के पेरोल पर था।

हमने कालोदक के सामने ढेरा डाला। विनोद पंडित व उसके साथियों ने यहाँ हाई-आल्टिट्यूड  तंबु कतार में खड़े करवा दिए थे।

संजय मोज़ा और मैंने भी एक तंबू में आराम किया। 

सब लोग हर्षित थे कि वे कश्मीर के उत्तर में 16,872फीट ऊँचे हरमुख शिखर के पूर्वी दामन में कालोदक अथवा कालसर के किनारे पर विश्राम कर रहे थे।

 आसपास में अगल-बगल के तंबुओं से तरह तरह की आवाज़ें आ रही थीं।हमारी बगल में पुणे के राहुल कौल, वृषाली और विट्ठल चौधुरी थे।पडोस में ही कहीं किसी अन्य तंबु से सुशील पंडित,रषनीक और लद्दाख से आए बादाम साहब की बतकही भी हवा में गूँज रही थी।

 मुझे यहाँ पास में ही कालसर के तट पर एक मस्जिद निर्माण के लिए निशानबंदी की गयी देखकर। ऐसे कैसे हो सकता है और क्यों ? यहां कौन मुस्लिम आबादी है ? एक भी नहीं रहता यहां ।फिर यह इस्लामी साम्राज्यवाद यहाँ तक कैसे आ पहुँचा है। मस्जिद के निर्माण के लिए शिलान्यास के रूप में एक विस्तृत क्षेत्र को पत्थरों से घेरा गया है और कहीं कहीं हरे रंग से चाँद तारा भी पेंट किया गया है।

मन यह देखकर दुखी था।तभी बगल के तंबू से हम तक जो बातें  आ रही थीं उनमें भी यह तीर्थ अधिग्रहण की चिंता थी।

 " यह सीनाज़ोरी है.." 

" मैं दो साल पहले भी आया था,

  तब नहीं  था ऐसा कुछ यहाँ.."

 " इससे बड़ी क्या मिसाल हो

   सकती है हमारे कल्चरल

   जीनोसाइड की .."

 " नहीं यह कश्मीरियत, जम्हूरियत और इन्सानियत है !"

 इसपर वहाँ हँसी का जैसे फव्वारा फूटा ।यह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर हज़ारों फीट की ऊँचाई से किया गया 'हाई-लेवल' मज़ाक था।

संजय मोज़ा से रहा न गया।वह तंबु से बाहर निकला और उस ठहाके वाले टैंट की तरफ चला गया।

इतने में पीछे से  किसी की आवाज़ सुनाई दी,"अरे आकाश में बादल आ गये हैं। महादेव से प्रार्थना करो , हमारी रक्षा करे।"

मुझे याद आया सन् 1988 में हम इसी कालोदक अथवा कालसर के तट पर दो टैंट गाडकर तीन -चार दिन रुके थे।तब संयोग से एक दिन हमारे दल ने हरमुख की चोटी को बिना  मेघों के देख पाए थे।अन्यथा यह गिरिश्रृंग मेघों से ढका रहता है।

हम अभिभूत होकर जैसे होशो हवास खो चुके थे।सामने मेघों की परतें धीरे-धीरे इस तरह खुल रही थीं जैसे शिव के गले से लिपटे श्वेत- श्याम मेघों के नाग हों और हवा में लहराने का आनंद ले रहे थे। मनुष्य देहधारी

बालक नन्दि को मृत्युंजय का वरदान देकर शिव उसे अपने साथ इसी हरमुख शिखर पर ले गये थे।

देखते ही देखते क्षण भर में ही हरमुख की चोटी फिर मेघाच्छादित थी। मुझे याद आया  तब हमारे एक भोले मित्र को हरमुख की निरभ्र चोटी देखकर निराशा हुई थी। वहाँ तो शिव उसे साक्षात दिखे भी नहीं उसे।

  " अग्निशेखर, क्या इस बात का कोई समाधान नीलमतपुराण में हमें मिलेगा कि यहाँ कालोदक  के किनारे से हरमुख पर शिव क्यों दिखाई न दिए?" उसने निरीहता से पूछा था।

मैं क्या जवाब देता ! मुझे स्मरण हो आया था...नन्दीश्वरस्य या मूर्तिर्दुराचारैर्न दृश्यते..नन्दीश्वर को दुराचारी नहीं देख सकेंगे।

उस रात हमने तंबु के सामने कैंप-फायर जलाकर सबने वो लोकप्रिय कश्मीरी गीत गाया था :

"हरम्वखॅ बरतल प्रारय मदाॅनो 
 यी दपहम ती लागयो 
पोष दपहम ग्वलाब लगय मदाॅनो
यी दपहम ती लागयो ..."

अर्थात् मैं हरमुख के द्वार/दर्रे पर बैठ तुम्हारी बाट जोहूँगी।तुम, ओ प्रिय ! जो कहोगो मैं वही अर्पण करूंगी। 

तुम फूल कहोगे , मैं चुनिंदा गुलाब तुम्हें अर्पण करूंगी। तब राजेश गगरू ने मुझे 'हरम्वखुक गोसोन्य' अर्थात् हरमुख के जोगी वाली कहावत के बारे मे बताने को कहा था।

  कहते हैं एक जोगी ने कैलास की तरह अविजित इस हरमुख शिखर पर चढ़कर मृत्युंजय का वरदान पाने हेतु लाख प्रयत्न किए।वह दिन भर जितनी चढ़ाई चढ़ता ,अगली सुबह अपने को यूनानी मिथक सिसिफस की तरह पहाड़ की तलहटी में वापस पहुँचा पाता। सिसिफस ने मनुष्य जाति के लिए मृत्यु को बंदी बनाया था ।

इसके दंडस्वरूप उसे एक अनगढ चट्टान को ठेलकर शिखर तक ले जाना होता है जहाँ वह कभी नहीं पहुंच पाता।बार बार हरमुख के गोसाईं की तरह पुनः वापस पहुँचता रहता है।हालाँकि दोनों के आशय प्रसंग अलग हैं।

मैं अभी भी तंबु में अकेला था।अब एक दो पडोस के तंबुओं में युवा तीर्थयात्री भजन-कीर्तन करने लग गये थे। अजब रहस्यमय माहौल बन चुका था।संजय भी इन्हीं तंबुओं में कहीं होगा।

मुझे अपने मोबाइल पर शिव तांडव स्तोत्र सुनने का मन हुआ।

कुछ ही क्षणों में अब मेरे तंबु से तांडवी ध्वनियां गुंजायमान हुईं।अरे..अरे! यह क्या ! चारों ओर से घबराई हुई आवाज़ें सुनाई पड़ीं। आकाश में मेघों के गर्जन की आवाज़ें सुनाई पडीं.. जैसे हरमुख के आकाश से इन्द्र स्वयं गा रहा हो :

      जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ।।

अर्थात् "जिन्होंने जटारुपी अटवी (वन) से निकलती हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गए गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डम डम शब्दों से मण्डित प्रचंड तांडव नृत्य किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करे।"

 तभी घनघोर वर्ष हुई। आंधी चलने लगी। हमारे  प्राण पखेरू सूखने लगे। 

चारों ओर से जयकारे गुंजायमान हुए .. जय हो.. जय हो..हर हर महादेव.. तंबुओं पर बरखा की बूँदें गोलियों की तरह बरस रही थीं। भीतर फर्श भीगने लग गये थे। पानी अंदर आ चुका था।

" अग्निशेखर जी,यह शिव तांडव क्यों बजाया आपने ? " यह बगल से अपने टेंट को उखड़ने से बचाने का प्रयास कर रहे राहुल कौल की आवाज़ थी जो अपने तंबु के रहवासियों के साथ कुछ कर रहे थे।

मैं इस संयोग से स्वयं चकित था। उसे क्या जवाब देता। कुछ देर के  बाद आशुतोष महादेव को दया आ गयी थी ।वर्षा थम गयी थी । आकाश धीरे धीरे निरभ्र हुआ जा रहा था।

दूसरे दिन दान्दलोट (नन्दिपूंछ ) के दूसरी तरफ गंगबल झील (11,714 फीट) की रषनीक  और सुशील पंडित आदि कुछ युवा साथी परिक्रमा पर निकले।इस झील की परिधि पाँच किलोमीटर और व्यास लगभग पौन मील है जो पर्वतारोही और यात्री चाव से पूरा देख आना चाहते है।

कुछ तीर्थयात्री रुटीन गंगा स्नान व पूजा में व्यस्त हुए । संजय मोज़ा, राहुल कौल, वृषाली और विट्ठल चौधरी के साथ हमने वहाँ कश्मीर में आतंकवाद की भेंट चढ़े और जम्मू के शरणार्थी-

कैम्पों में सांपों बिछुओं के काटे जाने और तरह तरह की पीडाओं से अपमृत्यु को प्राप्त हुए हज़ारों बंधु बान्धवों के नाम श्राद्ध संपन्न कराया।यह हमारा 2008 में चंद्रभागा (अखनूर) किनारे महाश्राद्ध के समय का अधूरा संकल्प था जो यहाँ संपन्न हुआ।

दूसरे दिन सुबह जलपान करने के साथ ही हमारी वापसी थी।फिर वही पथ,वही फूलों और देवदारों की तीखी मादक गंध,वही घास का सलवटदार मैदान त्रनख्वल (तृणकुल), फिर वही भूतेश्वर गिरि  लेकिन अब की बार खडी ढलान।

 सब यात्रियों में जैसे एक होड़ सी मची थी पहले नारान पहुँचने की । मैंने देखा विट्ठल चौधरी के पाँव सूझ गये थे और उसके जूते भी फट गये थे। उसके कदम इतने लड़खड़ा रहे थे कि उसकी बस हो गयी थी। वह अपनी आयु तथा कदकाठी के अनुपात में काफी ओवरवेट था।

मैंने उतरने की अपनी रफ्तार धीमी कर दी।उसका साथ दिया।हिम्मत बढ़ाई ।लेकिन एक वचन लिया ,वो यह कि वह दिल्ली पहुँच कर अपना कोई बीस किलो वज़न कम करेगा।

सब सहयात्री हमसे बहुत दूर नीचे उतर चुके थे और थकान की वजह से उनका सहायता के लिए विट्ठल चौधरी के पास वापस चढ़ना मुमकिन न था। स्थानीय पुलिस कर्मी भी अब धीरे धीरे हमसे आगे निकल चुके थे।मैं विट्ठल चौधरी का कभी हाथ पकड़ता, कभी उसे मेरे कंधे पर अपनी एक बांह रखकर चलने को कहता। उसके पाँव फट गए थे अब।

बहुत चुनौतीपूर्ण था वापसी का यह सफर । नारान नाग में बस कबसे  तैयार खड़ी थी। विट्ठल चौधरी की वजह से हम ही लेट थे।

हमारी बस नारान नाग को पीछे छोड़कर कंगन की ओर बढ़ रही थी जहां से वह श्रीनगर राजमार्ग पर दाहिने मुड़ती। थकान से सब की आँख लगी थी ।लेकिन मन  हरमुख की प्रत्यक्ष स्मृतियों में विचरण कर रहा था... 

Dr. Agni Shekhar
Poet , Writer, Activist in Exile

Destroyed Hindu Temples In Kashmir | From 1986 to 2018 Part-4

Previous
Next Post »