मुख्यमंत्री और अग्निशेखर की कविता || by Dr. Agni Shekhar || LIVE IMAGE

 Ghulam Mohammad Shah

संस्मरण  

●'आज तक' फेम वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी कुमार की बात सुनकर मेरे कान खड़े हो गए। वह भारतीय जनसंचार संस्थान,जम्मू की एक संगोष्ठी में बोल रहे थे।विषय था,भाषाई पत्रकारिता का भविष्य।संगोष्ठी में मैं भी आमंत्रित था अध्यक्ष के रूप में। 

● "कौन कहता है कविता जन संचार का माध्यम नहीं है.. ! मैं आपको अग्निशेखर जी की एक कविता का प्रसंग सुनाता हँ...कैसे एकबार जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री जी. एम. शाह इनका कविता-संग्रह ही मेरे हाथ से ले गये...." अश्विनी कुमार जी ने संगोष्ठी में सब की उत्सुकता बढ़ा दी ।जी.एम.शाह...यानी गुलाम मुहम्मद शाह..यानी डाॅ.फारूख अब्दुल्ला का सगा बहनोई गुलशाह ।  

अपने वक्तव्य में उन्हें मेरी एक कविता का प्रसंग याद आया। बोले,' संवेदना कैसे सीधे शब्दों में सुनने या पढ़ने वाले के दिल को छूती है,घटना सुनाता हूँ। 

● "मैं जम्मू शहर के शकुंतला थियेटर के एक कमरे में बैठा  जी.ए.शाह की प्रतीक्षा कर रहा था। वह मुझे बहुत प्यार करते थे।पत्रकार संजीत खजूरिया यहां हैं ,उन्हें यह अच्छी तरह से पता है" 

संजीत खजूरिया ने सिर हिलाकर हामी भरी।अश्विनी कुमार ने ब्यौरेवार वर्णन किया पूर्व मुख्यमंत्री का।कैसे उनका वहाँ आना पहले से तय था.. वह उस दिन क्या पहने हुए थे ..वह उनके कितने आत्मीय थे..तब भी जब सत्ता में थे...। 

● " जी.एम.शाह ने कमरे में प्रवेश करते मुझे एक पुस्तक पढ़ते देखा था,जो अग्निशेखर जी ने मुझे दी थी...आरम्भिक औपचारिकताओं के बाद उन्होंने मुझसे पूछा क्या पढ़ रहे थे ?" 

●" जिनाब,यह शायरी की किताब पढ़ रहा था"

  " किसकी है ?"

  " अग्निशेखर की .."

  " कौन है.."

  "एक अच्छा शायर है..कश्मीरी है "

  "अच्छा,नाम से तो नहीं लगता.."

  उन्होंने अग्निशेखर जी का कविता- संग्रह  टेबल से उठाकर देखा।उन्हीं दिनों प्रकाशित हुआ था।उन्होंने छूटते ही कहा," यह तो हिन्दी में है.."

   " वह हिन्दी में लिखते हैं..और अच्छा लिखते हैं.."अश्विनी कुमार जी ने उन्हें बताया।

  "तो सुनाओ कोई कलाम हमें भी.."

 " जी,ज़रूर.."

 " किताब का उन्वान,टाइटिलक्या है ?" उन्होंने पूछा।

" जिनाब,इसका शीर्षक है ...मुझसे छीन ली गई मेरी नदी "

  वह चौंक गये।

मैंने संक्षेप में संदर्भ का संकेत दिया...निर्वासन..

फिर मैंने संग्रह की पहली ही कविता उन्हें सुनाई जो कुछ इस तरह थी...

        "अरे,मेरा करो अपहरण

    ले जाओ मुझे अपने यातना-शिविर में

    कुछ नहीं कहूँगा मैं

    करो जो कुछ भी करना है

    मेरे शरीर के साथ

    ज़िंदा जलाओ

    काटो

    या दफन करो कहीं मुझे

    नदी के किनारे

    बर्फीले पहाडों पर

    किसी गाँव में

    या कस्बाई गली में

    कहीं घूरे के नीचे 

    मैं तरस गया हूँ

    अपनी ज़मीन के स्पर्श के लिए " 

मैंने देखा उनका चेहरा भावशून्य हो गया था।स्तब्ध।हमारे बीच सन्नाटा सा छा गया था कुछ पल।कविता का एक-एक शब्द उनकी रूह को छू गया था।यह करती है कविता। 

बोले," यह शायरी आग लगाएगी..."

 मैंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने पुस्तक नहीं लौटाई।

"यह किताब मुझे दे दो!"

"शाह साहब, आप तो हिन्दी पढ़ना जानते नहीं"

 " वो मुझपर छोड़िए.." 

फिर मुझे पता चला कि जी.एम.शाह साहब ने कश्मीर लौटकर हिंदी सीखने की ठान ली थी।एक शिक्षक रख लिया था।हिन्दी सीख ली थी उन्होंने,यह बात एक दिन उन्होंने बाद में मुझसे बताई भी थी घर में।" 

मैं अपनी कविता का यह प्रसंग सुनकर एक रचनाकार के तौर पर आह्लादित तो हुआ ही हुआ था,दंग भी रह गया । जीनोसाइड के पीड़ित और निर्वासन की त्रासदी की आँच उन सब राजनेताओं को भी कैसे न जलाएगी जो जेहादी आतंकवादियों व अलगाववादियों की तरह दोषी हैं।


Dr. Agni Shekhar
Poet , Writer, Activist in Exile

Delimitation Commission & Kashmiri Pandits Political Will || 4K || LIVE IMAGE

Previous
Next Post »