संस्मरण || तेज़ हवा ,आम का पेड़ और माँ || BY DR. AGNI SHEKHAR || LIVE IMAGE


जम्मू के आकाश में उस दिन सुबह से ही हल्के हल्के बादल छाने लगे थे।अम्माजी का अनुमान था कि कभी भी वर्षा हो सकती है। सुनकर मैं उदास हो गया था। कुछ दिनों के लिए कश्मीर गये  पिता की अनुपस्थिति में मेरी कुछ योजनाएं थीं जिनपर उसकी भविष्यवाणी से पानी फिरने वाला था। जैसे मुझे घर के सामने वाले  सिन्दूरी आम के उस पेड़ पर ऊँचाई तक चढ़कर वे दो मोटे आम उतारने थे जो मुझे कई दिनों से ललचा रहे थे।


हम रानीबाग में अकेले थे।दो -ढ़ाई एकड़ दीवारबंद उस रानीबाग में आम ,अमरूद, किंब, माल्टा, जामुन और केले के बड़े बड़े पेडों  के बीच खुराना-बिल्डिंग नाम की  जो दो मंज़िला पीली कोठी थी,उन दिनों हम उसी की छत पर बने एक बड़े से कमरे में रहते थे।


छत के चारों ओर पुख्ता जालीदार और नक्काशी वाली सीमेंट की चार दीवारी थी।खुले छत पर आकाश के नीचे अम्मा जी चूल्हे पर खाना बनाती और हम चारों छुटके भाई-बहन ऊधम मचाते।एकबार कश्मीर से आए छोटे चाचा ने , जिन्हें हम भैया कहकर पुकारते थे, इस छत पर पिता की पुरानी साइकिल गोलचक्कर काटते  चलाई थी।तब उन्होंने रात- दिन साइकिल चलाकर चर्चित हुए अफसरखान के कितने किस्से सुनाए थे।
 
मैं बार बार आकाश की तरफ देखता। हे भगवान, इन मेघों से गगन को साफ करो न ! मुझे सामने वाले कभी यह खुराना-बिल्डिंग महाराजा हरिसिंह के पोलो खेलने के बाद विश्राम के लिए बनाई गयी थी। इसे बाद में एक दिन महाराजा ने जम्मू शहर के खुराना नाम के अपने किसी पदाधिकारी को दान में दिया था।


इसकी दूसरी मंज़िल के बरामदे में बैठकर आम के वृक्षों के ऊपर से जम्मू हवाई अड्डे में कतारबद्ध विमान दिखते।हमारी छत के ऊपर से दिन में कितनी ही बार जहाज़ उतरते और उड़ान भरते रहते।पास से ही रडार की खटखटखट आवाज़ लगातार आती रहती।


रानीबाग में उन दिनों हमारे सिवा कोई नहीं था। इस बाग में आमों के नीचे आईटीबीएफ की एक जेल थी जहाँ पाकिस्तानी जासूसों को पकड़कर अस्थाई रूप से कुछ दिनों के लिए बंद रखा जाता । कभी कभार लद्दाख जाने वाले या वहाँ से आने वाले सीमा सुरक्षा के बलों के जवान रानीबाग में रुकते ।तब कतारों में तंबु खडे किए जाते और एक रौनक आती हमारे इस रानीबाग में।


पिता को अपने बहनोई के निधन की सूचना पोस्ट-कार्ड से मिली थी और वह तुरत-फुरत दूसरे दिन ही कश्मीर के लिए निकले थे। उन दिनों जेल के सभी कमरे खाली थे और समूचा रानीबाग सूना था।इसलिए हम अकेले थे। और मैं खुश था कि पिता कश्मीर चले गये थे। अम्माजी उदास थी। पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर में कई निकट के सम्बंधी मर गये थे और वह ऐसी घड़ी में मातृभूमि से कितना दूर थीं परदेस में।


मैंने देखा,अम्मा जी कश्मीर की यादों में खोकर कुछ गुनगुनाने लगी हैं।मैं चुपके से उसके आस -पास से खिसक कर जल्दी से सीढियां उतरा।आगँन में नंगे पाँव सामने के पेड़ पर चढ़ने लगा। रानीबाग का यही एक आम का पेड़ था जिसपर मैं कभी चढ़ा न था। एक तो वजह यह थी कि कोठी के सामने था ;और बाकी आमों की अपेक्षा कमज़ोर और कच्ची उम्र का पेड़ समझा जाता था। एक तरुण पेड़ जिसकी डालें एक ऊँचाई से सीधे ऊपर ऊपर तक गयीं थीं। सपाट। बीच से कोई टहनी नहीं फूटी।इसलिए इसपर चढ़ने की मनाही थी।


दूसरे,छत वाले कमरे से या बरामदे से पिता की सीधी नज़र पड़ती या अम्माजी देख लेतीं; और वो भी ऐसे जैसे हाथ बाहर निकाल पकड़ लेतीं। दूसरे, इस पेड़ पर उतने फल भी नहीं लगते। पिता ने एकबार अम्माजी से कहा था, " यह पेड़ तुम्हारा फुफेरा भाई कंजूस पोषटोठ जैसा है  !"
यह सुनकर मैं चौंक गया था। पेड़ को पिता ने  तो मेरा मामा बना दिया था। कंजूस ही सही।
अम्माजी अब कोई मार्मिक कश्मीरी गीत खुले गले से गाने लग पड़ी थी। आवाज़ कोठी की दूसरी मंज़िल से आमों और अमरूदों के ऊपर से पूरे रानीबाग में गूँज रही थी।


मैंने सोचा यदि मेरे छोटे भाई वीरजी ने चुगली नहीं खाई तो अम्माजी को पता भी न चलेगा कि मैं इस पेड़ पर चढ़ रहा हूँ। मैं सांस रोककर दसेक फुट तक पेड़ चढ़ गया था।मेरी आकुल आंखों को अब वो दो मोटे मोटे आम दिखाई दे रहे थे। अभी दूनी ऊँचाई और चढ़नी थी। अब मैं एकाग्र भाव से धीरे से और सधे हुए हाथ-पाँव से एक एक गिरह चढ़ने की कवायद में लगा था।


दोनों आम अब डाल हिलने से झूलने लगे थे।मैं सांस रोककर दसेक फुट तक पेड़ चढ़ गया था।मेरी आकुल आंखों को अब वो दो मोटे मोटे आम दिखाई दे रहे थे।अभी दूनी ऊँचाई और चढ़नी थी।अब मैं एकाग्र भाव से धीरे से और सधे हुए हाथ-पाँव से एक एक गिरह चढ़ने की कवायद में लगा था दोनों आम अब डाल हिलने से झूलने लगे थे।


मुझे लगा कि ये पेड पर मेरे चढ़ने से हिलने लगे हैं जो सच भी था, लेकिन एक नया अतिरिक्त सच यह भी था कि सहसा तेज़ हवा चलने लगी थी जिसकी वजह से साँय साँय की आवाज़ गूँजने लगी थी।
तभी अम्माजी को शायद मेरा ध्यान आया होगा कि जाने कहाँ गया होगा।उसने मेरा नाम लेकर मुझे पुकारा। उसकी सुरीरी आवाज़ में चिंता थी।


मैं घबरा गया। मैंने सोचा कि अब तो मैं पकडा गया।डांट पडेगी।और मनचाहे आम तोड़ने से रह जाऊंगा। इसलिए अम्माजी की पुकार को अनसुना कर फुर्ती से दो-ढ़ाई फुट और ऊपर को सरका। डंगाल को कसकर पकड़ते हुए था। हवा डरा रही थी। डाल मेरे बोझ से भी झुकती हुई सी लगने लगी।



अम्माजी की नज़र मुझपर पड़ी।उसने बड़ी बुद्धिमानी से काम लिया। बोली,''बंदर कहीं के, घबराना बिलकुल नहीं। मुझे बताया होता तो मैं कहती कल तोडना ये आम " | हवा के झोंके तेज़ होने लगे और मैं जस का तस डाल से लिपटा रहा। डर लगने लगा, कहीं यह डाल क्राफ् की आवाज़ करती टूट न जाए और मैं यथार्थ में बंदर तो हूँ नहीं कि बच जाऊँगा।


" बेटा, घबराओ मत.. धीरे से वापस उतरो..सावधानी से..."
अम्माजी संयत स्वर में मुझसे संवाद करती हुई प्रतीत नहीं हो रही थी। मुझे ढाढस बंधा रही थी।
सहसा मैं बुरी तरह से घबराने लगा। रुआँसी आवाज़ में मैंने अम्माजी से कहा," मैं गिर जाऊँगा।यह डाल टूट जाएगी" | अम्माजी छूटते ही बोली," रुको वहीं पर।घबराओ मत। मैं आती हूँ " मेरी कुछ हिम्मत बंधी लेकिन डर समाप्त नहीं हुआ।


अम्मा जी बचपन में अपने मायके गोशबुग में अखरोट के पेडों पर भी चढ़ती थी।गाँव में उसके पेडों पर फुर्ती से चढ़ने-उतरने,उछलने-कूदने के चर्चे थे। नानी से सुना था जब विवाह के बाद एक बार पिता ससुराल आए थे तो वह उस समय नाशपाती के पेड़ पर थी और वहीं से उसने माँ को आवाज़ देकर शहर से पधारे पति को सूचना दी थी |


कि मैं आई।अम्माजी हँसते हुए मुझसे बात करती हुई जल्दी जल्दी पेड़ चढ़ती गयी और पलक झपकते मेरे करीब पहुँच गयी। उसने मुझसे लगभग चार-पाँच फीट नीचे खुद को दो डालों की क्राॅसिंग पर दृढ़ता से स्थिर किया। उसके मुँह पर चिंता का एक शिकन भी न था। उसने मेरी वाली डाल को अपनी दोनों बाँहों से पकड़ कर एक घेरा बनाया । उसमें धैर्य से मुझे हँसते हुए धीरे धीरे उतरने को कहा।


पहले तो मेरी हिम्मत न हुई, फिर पता नहीं कैसे छिलता हुआ सा इंच-इंच उतरने लगा। वह शाबाशी देती रही। हवा साँय साँय कर रही थी। पेड़ कभी दांए और कभी बांए झूम रहे थे। मैं अम्माजी के भुजा-कवच में धीरे धीरे उतरता जा रहा था।अब वह भी मेरी सुरक्षा सुनिश्चित करती हुई एक एक पग नीचे उतर रही थी।


कुछ ही देर में हम आँगन में उतरे और धूल व आंधी को चीरते हुए जल्दी से खुराना-बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़े।अम्मा जी अपने इष्टदेव नन्दिकेश्वर भैरव का बारंबार आभार बुद्बुदाती हुई  दरवाज़ा बंद करके फर्श पर धड़ाम से गिर पड़ी। मैं दौड़ते हुए उसके पास गया। उसने मुझे झट से गले से लगाया और रोने लगी। उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह रही थी। मुझे बार बार सीने से लगाकर ईश्वर का धन्यवाद कर रही थी," तू कैसे बच गया रे ! मैंने दिल पर पत्थर रखकर तुमको पेड़ से गिरने से बचाया..हमारा क्या हाल होता ..पिता भी नहीं था तेरा यहा.." 


माँ को रोते हुए देखकर छोटा भाई और दोनों छोटी बहने भो रोने लग पडी थीं।
सहसा अम्माजी ने स्वयं को संभाला। हम सबको ढाढस दिया। हँसते हुए बोली," चलो अब शाम का खाना बनाते हैं। फिर मैं एक रोचक कहानी सुनाऊंगी।"
 सोचता हूँ यदि माँ मुझे तेज़ आंधी में पेड़ से उतार न पाइ होती तो यह अनुभव आपसे साझा करने वाला कहाँ बचा होता !










Dr. Agni Shekhar
Poet,Writer, Activist in Exile

सम्पर्क : बी-90/12, भवानीनगर, जानीपुर , जम्मू-180007

मोबाइल : 9697003775



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